एपिसोड 1 : बुंदेलखंड की विधानसभा का अंकगणित 1952

आशुतोष नायक
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सोचिए... आप चुनाव मैदान में उतरे हैं। जनता आपको जी-जान से वोट देती है। जब नतीजा आता है, तो आपको अपने विरोधी से ज्यादा वोट मिलते हैं। आप जश्न मनाने की तैयारी करते हैं... लेकिन तभी चुनाव अधिकारी आता है और कहता है—'माफ कीजिए, आप ज्यादा वोट पाकर भी हार चुके हैं और आपसे कम वोट पाने वाला विधानसभा जा रहा है!'

चौंक गए न? आप सोचेंगे ये कोई धांधली है? जी नहीं! यह आज़ाद भारत के पहले चुनाव का वो कानूनी और गणितीय पेच था, जिसने बुंदेलखंड की राजनीति में एक ऐसा क्लाइमेक्स रच दिया, जिसकी गूंज आज भी इतिहास में सुनाई देती है। स्वागत है आपका... 'अंकगणित' में!"

साल था 1952। देश में पहली बार वोट पड़ने जा रहे थे। नेताओं में उत्साह था और जनता में कौतूहल। आज जब हम बुंदेलखंड की बात करते हैं, तो हमारे दिमाग में विधानसभा की 19 सीटें आती हैं। लेकिन 1952 के अंकगणित का पहला अनोखा नियम सुनिए—इलाके थे 16, लेकिन विधायक चुने गए 20! 

अब आप सिर खुजलाने लगेंगे कि ये कैसा जोड़-घटाना है? दरअसल, उस दौर में देश में 'द्विसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र' (Double-Member Seats) हुआ करते थे। यानी एक ही विधानसभा क्षेत्र से दो-दो विधायक चुने जाते थे—एक सामान्य सीट के लिए और दूसरा अनुसूचित जाति (SC) वर्ग के लिए। बुंदेलखंड की 16 में से 4 सीटें ऐसी ही थीं, जिन्होंने विधायकों का आंकड़ा 16 से बढ़ाकर 20 कर दिया।"

अब आते हैं हमारी कहानी के सबसे बड़े ट्विस्ट पर। सीट नंबर 150—कालपी सह जालौन उत्तर! इस द्विसदस्यीय सीट पर वोटों की गिनती चल रही थी। यूपी प्रजा पार्टी के वीरेंद्र शाह 27,805 वोट पाकर नंबर वन पर रहे और उन्होंने सामान्य सीट जीत ली।

अब लड़ाई थी दूसरी सीट यानी आरक्षित (SC) सीट की। मैदान में कांग्रेस के दो बड़े उम्मीदवार थे—शिव शंकर सिंह और बसंते। जब आखिरी राउंड की गिनती खत्म हुई, तो आंकड़े देखकर अधिकारियों के पसीने छूट गए!

  • शिव शंकर सिंह (कांग्रेस) को मिले: 18,853 वोट

  • बसंते (कांग्रेस) को मिले: 18,842 वोट

गणित कहता है कि शिव शंकर सिंह ठीक 11 वोटों से आगे थे! लेकिन नियम यह था कि दूसरी सीट सिर्फ आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार को मिल सकती थी। शिव शंकर सिंह सामान्य वर्ग से थे, इसलिए उनके ये 18,853 वोट धरे के धरे रह गए। सिर्फ 11 वोट कम पाने के बावजूद, आरक्षित वर्ग में सबसे आगे होने के कारण बसंते को विजेता घोषित कर दिया गया! सोचिए, उस रात शिव शंकर सिंह पर क्या गुजरी होगी... सिर्फ 11 वोटों का फासला, लेकिन इतिहास बदल गया!"

बुंदेलखंड का यह अंकगणित जहाँ कालपी में दिल तोड़ रहा था, वहीं झांसी पूर्व (सीट नंबर 147) में एकतरफा मोहब्बत की दास्तान लिख रहा था। कांग्रेस के आत्माराम गोविंद खेर ने इस सीट पर ऐसा जादू चलाया कि विपक्ष के परखच्चे उड़ गए। उन्हें मिले पूरे 66.46% वोट! यह उस चुनाव में पूरे बुंदेलखंड का सबसे बड़ा रिकॉर्ड था। इसी लोकप्रियता के दम पर वे बाद में उत्तर प्रदेश विधानसभा के पहले अध्यक्ष (स्पीकर) बने।

लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी देखिए। बबेरू पश्चिम (सीट नंबर 158) में मुकाबला कांटे का नहीं, बल्कि कांटे की नोक का था! कांग्रेस के राम सनेही भारतीय को मिले 7,995 वोट और निर्दलीय जगेस्वर को मिले 7,936 वोट। हार और जीत के बीच का अंतर? सिर्फ 59 वोट! यहाँ की जनता ने नेताओं को अपनी उंगली की ताकत का ऐसा अहसास कराया कि सांसें आखिरी बक्से तक अटकी रहीं।"


तो देखा आपने? 20 विधायकों में से 18 विधायक जीतकर कांग्रेस ने भले ही बुंदेलखंड में एकतरफा साम्राज्य खड़ा कर लिया था, लेकिन मौदहा में एक निर्दलीय की बगावत, महोबा में सोशलिस्ट पार्टी की दहाड़, बबेरू की 59 वोटों की वो धुकधुकी और कालपी का वो 11 वोटों का कानूनी चक्रव्यूह... यह साबित करता है कि बुंदेलखंड का वोटर पहले दिन से ही राजनीति के गणित में 'मास्टर' था!

आंकड़ों का यह रोमांच यहीं खत्म नहीं होता। अगले एपिसोड में हम परिसीमन के उस नए दौर में चलेंगे, जहाँ ये सीटें बदल गईं और समीकरण भी। आपको हमारा यह अनोखा अंकगणित कैसा लगा, कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर बताइएगा। वीडियो को लाइक और शेयर करना मत भूलिए। देखते रहिए... 'अंकगणित'! नमस्कार।


 

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